महल बस अपनी गाते हैं
झोपड़ियों की कब सुनते हैं हुकुम चलाते हैं
महल अपनी ही गाते हैं
वहां पर दुखड़े पहुंचाने आसान नहीं होते
सुनते हैं महलों के बिल्कुल कान नहीं होते
महल तो ऊपर देख रहे हैं नीचे कौन निहारे
दीन तो मर ही जाते यदि भगवान नहीं होते
होते हैं आकाश में नीचे जब भी आते हैं
महल जमीं पर सिंहासन की धोंस जमाते हैं
महल अपनी ही गाते हैं
ऊंचे ऊंचे महल बने हैं उनमें राजा रानी
उनकी गाथा जादू जैसी अपनी दुखी कहानी
हम खेतों में अन्न उगा कर महलों में ले जाते
उनके हिस्से खाना है अपनी आंखों में पानी
महल ही अपने वैभव से इतिहास लिखाते हैं
फिर अपने गुंबद मुडेर से उसे सुनाते हैं
महल अपनी ही गाते है
मजदूरों ने जब महलों की ऊंची भीत बनाई
खून पसीना बहा दीनका पर ना दया दिखाई
दीनों को कब महलों ने यूं हंसके गले लगाया
महलों और झोपड़ी में है कितनी गहरी खाई
महल चाहकर प्रजा जनों को व्यर्थ दबाते हैं
अपने अहंकार के आगे उन्हें झुकाते हैं
महल अपनी ही गाते हैं
महलों के प्रतिमान बने हैं अब ये पैसे वाले
ऊंचनीच और जातिवाद के लगादिए हैं ताले
शोषण दमन कर्ज दानव से कैसे मुक्ति पाएं
गरीबों के स्वाभिमान को किसके करें हवाले
बहु मंजिला इमारतों के महल चिढाते हैं
जनता की कमाई से सब आराम जुटाते हैं
महल अपनी ही गाते हैं
झोपड़ियों की कब सुनते हैं हुकुम चलाते हैं
महल तो अपनी आते हैं
महल अपनी ही आते हैं
महल बस अपनी आते हैं
रामबाबू शर्मा 'राज'
जयपुर
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