: आजकल कुछ इंसान बाहर से बिल्कुल सामान्य लगते है,
अगर नही भी हैं तो सामान्य दिखने की पूरी कोशिश करते हैं ताकि भीतर का शोर कहीं किसी को सुनाई न दें।
सबकुछ अपने भीतर दबाकर जीना मानो सीख ही लिया हो।
रोना आता है मगर रोयेंगे तो कमजोर समझे जाएँगे,
गुस्सा आता तो है पर बाहर आ गया तो लोगों के सामने अपनी छवि खराब हो जाएगी, किसी के प्रति प्रेम है, अपनापन है मगर सवाल ये है की
हम क्यूँ बताएं?
मन में किसी के लिए द्वेष है, ईर्ष्या है
जलन है पर मजाल है जो कभी चेहरे पर नजर आए।
किसी बात का डर है मन में पर उसे मानने से भी इंन्कार है।
इस समाज ने, रिश्तों ने,हालातों ने सबकुछ सहकर चुप रहने का मतलब
मैच्योरिटी यही सिखाया है।
भावनाओं को दबाकर चलने वाला इंसान आज के युग में सभ्य और संस्कारी माना जाता है।
और लंबे समय तक इस तरह जीते- जीते इंसान पत्थर सा बन जाता है।
फिर उसे फ़िर कुछ भी महसूस नहीं होता, वह भीतर से टूटने लगता है।
कभी खत्म न होनेवाली मन की एक ऐसी थकान जो सोचने पर मजबूर कर देती है कि हम मरने के लिए जी रहे हैं या फ़िर जीने के लिए मर रहे हैँ.....
कविता राजपूत
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