प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली
आज वर्ष फिर बीत रहा है,
कहीं नहीं उसका क्रन्दन है।
जीवन के अंतर को खोकर,
हम कहते "यह तो नूतन है"।।1।।
नूतन का सुस्वागत करने,
आतुर बने सब जग-जन हैं।
खोया जो, उसका हिसाब नहिं,
यों नूतन-वर्ष का अभिनन्दन है?2।।
दिन-दिन बीते दुर्लभ नर-भव,
तनिक नहीं इसका संवेदन है।
बीते को यहाँ कौन सुमरता ?
नवागन्तुक-हित स्पन्दन है!!3।।
नहिं इसका विचार करें जन,
करते किसका अनुरंजन है?
पल-पल आयु क्षीण हो रही,
हम करते रहते चित-रंजन हैं।।4।।
"वर्ष बीत गया" हम कहते हैं ,
काल अकाल-मृत्यु नहिं मरता।
हम ही बीतते जाते प्रतिक्षण,
नव-वर्ष का करते अभिनन्दन है।।5।।
अरे! सुजन! तुम तनिक विचारो,
करना दूर यह भव-बन्धन है।
जब ऐसा कर पाओगे तब,
नव-संवत् का अभिनन्दन है।।6।।
जब आत्मोत्थान किया नहिं,
तब तक जीवन भव-क्रन्दन है।
पराधीन-नर ही यहाँ बीतते,
आत्मजयी का अभिनन्दन है।।7।।
आवागमन की सतत-कहानी,
काल-साक्षी संतों की वाणी।
दुःख-सन्तति यदि नहीं बढ़ानी,
तो संकल्पित हो बनो तुम ज्ञानी।।8।।
आत्मज्ञान-बिन व्यथा-कहानी,
तुम्हें अपनी हो नहीं बनानी।
प्रियवर! अब तो बूझो निज को,
सिद्ध-शिला में अभि-वन्दन है।।9।।
ऐसा जीवन-शिल्प गढ़ो तुम,
निज-स्वरूप में सिद्ध लखो तुम।
ऐसा नव-संवत्सर जब आये,
तब जग गाये अभिनन्दन है।।10।।
काल कभी अभिनन्दनीय नहिं,
काल की स्वयं पहिचान नहीं है।
कोई 'नर' जब 'नारायण' बनता,
उसी काल का अभिनन्दन है।।11।।
संपर्क दूरभाष : 8750332266
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