सप्त गुण युक्त दान सात्विक दान

 वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भीलुड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतर्राष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि आंगम में नवधा भक्ति तथा सप्त गुण युक्त दान है वह सात्विक दान है। विधिपूर्वक जिस दान में अतिथि का साक्षात स्वयं आदर किया जाता है जिसमें दाता के सप्त गुण प्रकाशित होते हैं ऐसे दान ही स्वर्ग मोक्षदायक है। जिसमें पात्र व दाता दोनों के भाव सम्यक होते हैं स्वयं दाता मार्ग प्रत्यक्षा करते हैं चाहे साधु जंगल में हो या शहर में। यदि भाव शुद्ध है तो कोई पाप बंध के लिए कारण नहीं होगा इसका दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा। वर्तमान में सात्विक दान कुछ व्यक्ति में ही है। गाय घास खाकर भी दूध देती है वैसे ही दान का फल तत्काल भी मिल सकता है अथवा बाद में भी मिलता है। भक्ति के बोझ से विनम्र होकर केवल शाक का, सब्जी का फलाहार आदि भी आहार देते हैं तो वह अपरिमित पुण्य का कारण है। सात्विक दान बहुत कम लोग देते हैं स्व न्याय उपार्जित धन का स्व पर उपकार के लिए जिसका विसर्जन किया जाता है वह सात्विक दान है। जिस दान में अतिथि का साक्षात स्वयं आदर किया जाता है दान देने की नव कोटी से भावना करनी चाहिए। विचारों की तत्परता वात्सल्य उत्साह से युक्त होकर दान देना चाहिए इसमें कमी होने पर सात्विक दान में भी कमी हो जाती है पुण्य भी कम लगता है। शाक अर्थात पत्ती।

 राजसिक दान का वर्णन करते हुए आचार्य श्री बताते हैं अपनी स्तुति सुनने के अभिलाषी दाता, आलस से युक्त आदर युक्त होकर कीर्ति की कामना से आतुर होकर गर्व पूर्वक अतिथि को दूसरों को प्रभावित करने के लिए जो दान करते हैं वह राजसिक दान है यह मध्यम श्रेणी का दान है जैसे नौकरों से सेवा कराना। इसका फल भी स्वर्ग में उच्च जाति के जो देव हैं उनके वाहन हाथी घोड़ा आदि बनना पड़ेगा अथवा कुभोगभूमि में जन्म लेना पड़ेगा।

 पात्र अपात्र का विचार किए बिना, विवेक से रहित, आदर से रहित, सप्त गुणो से रहित,अहंकार से दिखावे के लिए मात्सर्य भाव ईर्षा से सहित, योग्य पात्र को भी गलत पद्धति से दिया गया दान तामसिक दान है। इसका उदाहरण है एक राजा बसंतोत्सव मनाने के लिए जा रहे थे राजा ने साधु को आते हुए देखा तो रानी को आदेश दिया की साधु के लिए आहार की व्यवस्था करो। रानी को क्रोध आया उसको अच्छा नहीं लगा उसके मनोरंजन में बाधा हो रही थी उसने कड़वी तोमडी का आहार साधु को दिया। जिसके कुफल के कारण रानी को  गलीत कुष्ठ रोग हो गया। उत्तम काल होने पर भी उत्तम भाव नहीं होने पर उत्तम गुरु, भगवान भी कुछ नहीं कर सकते। साधुओ की निंदा महिलाएं अधिक करती हैं। योग्य साधु को देखकर भी खोटा भाव रखने से अधिक पाप बंध होता है। योग्य पात्र के लिए खोटे भाव से दिया गया दान भी कुदान हो जाता है।

 संकलन कर्ता  विजयलक्ष्मी

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