माँ भारती के सच्चे आराधक युगदृष्टा भारतरत्न महामना मदनमोहन मालवीय

 आज माँ भारती के सच्चे आराधक युगदृष्टा भारतरत्न महामना मदनमोहन मालवीय का जन्मदिन है। वे कांग्रेस पार्टी और हिन्दू महासभा के चार बार अध्यक्ष रहे। उन्होंने देश की शिक्षा प्रणाली को भारतीयता से ओतप्रोत करने के उद्देश्य से सन 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की तथा चौरीचौरा आंदोलन के सेनानियों का मुकदमा लड़कर उन्हें मृत्युदंड से बचाने का महती कार्य किया। मालवीय जी के जीवन दर्शन पर मैंने पंडित मदनमोहन मालवीय शीर्षक से एक पुस्तक लिखी थी जो सन 2010 में लक्ष्मी प्रकाशन, जी- 30/बी गली नम्बर 4, गंगा विहार, दिल्ली से प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तक की समीक्षा अमित द्विवेदी जी ने कुछ वर्ष पूर्व जर्मन रेडियो पर प्रसारित की थी। उन्हें धन्यवाद देते हुए मालवीय जी की जयन्ती पर उन्हें नमन।

आज ही देश के सर्वश्रेष्ठ राजनेताओं में अग्रगण्य भारतरत्न कवि ह्रदय, हिन्दी प्रेमी अटल जी का जन्मदिन है। उनको उनकी ही एक कविता के माध्यम से विनम्र श्रद्धांजलि 

क्या खोया, क्या पाया जग में

मिलते और बिछुड़ते मग में

मुझे किसी से नहीं शिकायत

यद्यपि छला गया पग-पग में

एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी

जीवन एक अनन्त कहानी

पर तन की अपनी सीमाएँ

यद्यपि सौ शरदों की वाणी

इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाज़ा खोलें!

जन्म-मरण अविरत फेरा

जीवन बंजारों का डेरा

आज यहाँ, कल कहाँ कूच है

कौन जानता किधर सवेरा

अंधियारा आकाश असीमित,प्राणों के पंखों को तौलें!

अपने ही मन से कुछ बोलें!

आज आधुनिक हिन्दी साहित्याकाश के सशक्त हस्ताक्षर धर्मवीर भारती की जयंती पर उन्हें विनम्र नमन। रागात्मकता और प्रकृति के सौंदर्य के आधुनिक व्याख्याकारों में धर्मवीर भारती अग्रगण्य हैं। गुनाहों का देवता के प्रकाशन के 50से अधिक वर्ष बीतने के बावजूद यह कृति आज भी युवा दिलों में प्रेम की धड़कन उमगाती है। कनुप्रिया की राधा के प्रश्न आज भी जीवंत है और एक सम्पादक के रूप में धर्मयुग के माध्यम से असंख्य कवियों लेखकों को पैदा करने का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाना चाहिये। कविता की बेहतर समझ और उपन्यास की परंपरा में नव्यता का प्रवर्तन करने का श्रेय उन्हें है। कनुप्रिया के समापन अंश के साथ जन्मदिवस पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

क्या तुमने उस वेला मुझे बुलाया था कनु ?

लो, मैं सब छोड़-छाड़ कर आ गयी !

इसी लिए तब

मैं तुममें बूँद की तरह विलीन नहीं हुई थी,

इसी लिए मैंने अस्वीकार कर दिया था

तुम्हारे गोलोक का

कालावधिहीन रास,

क्योंकि मुझे फिर आना था !

तुमने मुझे पुकारा था न

मैं आ गई हूँ कनु ।

और जन्मांतरों की अनन्त पगडण्डी के 

कठिनतम मोड़ पर खड़ी होकर

तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ ।

कि, इस बार इतिहास बनाते समय

तुम अकेले ना छूट जाओ !

सुनो मेरे प्यार !

प्रगाढ़ केलि-क्षणों में अपनी अंतरंग

सखी को तुमने बाँहों में गूँथा

पर उसे इतिहास में गूँथने से हिचक क्यों गए प्रभु ?

बिना मेरे कोई भी अर्थ कैसे निकल पाता

तुम्हारे इतिहास का

शब्द, शब्द, शब्द...

राधा के बिना

सब

रक्त के प्यासे

अर्थहीन शब्द !

सुनो मेरे प्यार !

तुम्हें मेरी ज़रूरत थी न, लो मैं सब छोड़कर आ गई हूँ

ताकि कोई यह न कहे

कि तुम्हारी अंतरंग केलि-सखी

केवल तुम्हारे साँवरे तन के नशीले संगीत की

लय बन तक रह गई....

मैं आ गई हूँ प्रिय !

मेरी वेणी में अग्निपुष्प गूँथने वाली

तुम्हारी उँगलियाँ

अब इतिहास में अर्थ क्यों नहीं गूँथती ?

तुमने मुझे पुकारा था न!

मैं पगडण्डी के कठिनतम मोड़ पर

तुम्हारी प्रतीक्षा में

अडिग खड़ी हूँ, कनु मेरे !

आज भारत के विभाजन के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना का भी जन्मदिन है। भारत में जिस तरह गांधी जी राष्ट्रपिता है, वैसे ही पाकिस्तान में जिन्ना का दर्ज कायदे आज़म का है। हालांकि इतिहास कई किन्तु परन्तु के बीच भारत विभाजन के गुनाहगारों में जिन्ना का नाम सर्वप्रमुख है लेकिन यह भी सच है कि नागपुर अधिवेशन में नई नवेली दुल्हन रतन बाई पेटिट के आगे कांग्रेसियों ने जिन्ना की बेइज्जती न की होती तो शायद देश का इतिहास कुछ और होता। एक दूसरा सच यह भी कि इससे दुखी होकर वे तो लन्दन में जाकर बस गए थे लेकिन अगर लियाक़त अली उन्हें वापस न लाता तो भी यह नौबत न आती। तीसरी बात यह कि पाकिस्तान बनने के बाद वे अपने जीवन के अंतिम क्षणों में पश्चाताप की अग्नि में जल रहे थे। उनके विवादास्पद चरित्र पर मैंने विगत 2009 में जिन्ना का सच शीर्षक से एक पुस्तक डॉ शेषराव चव्हाण जी के साथ मिलकर लिखी थी, जो अटलांटिक पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई थी और वर्ष 2022 में इसका पुनर्मुद्रित संस्करण प्रकाशित किया गया है। काश, इस विवादास्पद चरित्र का निधन पहले हो जाता तो  सन 1947 में देश के दो (अब तीन) टुकड़े न हुए होते।

© प्रो. पुनीत बिसारिया

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