तेरी सोच ही तेरा अस्तित्व

सुरेश चौधरी 

सामान्य दशा में जब तक देह है तब तक अस्तित्व है देह के पञ्च तत्व में विलय के पश्चात उसका अस्तित्व नही रह जाता, परन्तु वेदों, उपनिषद एवं श्रीमद भागवतम में

आत्मा को सर्वोपरि माना गया है, यह अजर-अमर अविनाशी है, आपकी आत्मा जैसे कर्म को पीछे छोड़ जायेगी वही अनादि काल तक उसके अस्तित्व दर्शाएगी, इसी आधार पर सुकर्मों को करते हुए आत्मा का अस्तित्व मनुज को स्थापित करना चाहिए।।

अस्तित्व निष्कर्ष होता आत्मा के अमल कर्म का,

सतत शांत दीप जला, ज्ञान उदित आत्म धर्म का,

नाविक निकल चल ले संग अति ससक्त पतवारें

जीवन- भंवर में फँसी नैया, सागर पार इसे लगा रे

जल में स्पंदन

करता तरंगों का सृजन

आत्मा की सोच होती सरिता सम,

निर्मल मृदु मृदु अनवरत,

मिलती सरिता धारा

सागर की लहरों से अनवगत

सरिता का मिलन तो

सागर में समर्पण का

अंतिम बंध है,

ज्यूँ अबाध जीवन मलय की गति

उपवन की सुरभित सुगंध है,


व्यक्तित्व ढूँढता अस्तित्व को निज अंतस सुधा से

अकल्मष भी रहता स्व-कर्मों के गुंजन की थाह से

अतिविर्यवान बनना जग निर्माण हेतु निज भुजा से

र्मोक्ष योग पायेगा निश्चय जन कल्याण की राह से


अंतर्मन का आत्मा से मिलन

समकालीन जीवन व्यवस्था है

मन एवं तन नही आधार अस्तित्व के

अस्तित्व तो स्थिर चेतन आत्मा की अवस्था है

शक्ति-रूप, ज्ञान-रूप, आनंद-रूप आत्मा

अहैतुक, भौतिक गुणों से परे होती आत्मा,

तन के रथ पर शोभित

चंचल मन को संचालित करती 

रथवान सी आत्मा,


तेरी आत्मा ही तेरा अस्तित्व, तेरी आत्मा ही मार्ग,

सकारात्मक हो सोच तो निकट होते लक्ष्य हमारे

तेरी कीर्ति तेरी कृतियाँ, कृति नैसर्गिक सौम्य हो

आदर्श हों ऊँचे तो यश अमर रखे अस्तित्व हमारे


आत्मा होती अंतस प्रकाश मानव की

आत्मा होती मुक्त त्रिगुणी अनुभव की

चिर परिचित प्राणों के स्पंदन की

अपने ही सुख से चिर चंचल मन की

शांत उर सरोवर की

परमात्मा रूपी सागर में

विलय को आतुर आत्मा

जीवात्मा स्वामी से

मिलन को आतुर आत्मा

जीवन सरिता है आत्मा

मनुज है असत्य

मानव अस्तित्व है ब्रह्म

ब्रह्म-ज्योति से मिलन को व्याकुल आत्मा

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