डॉ. श्रीकृष्ण "जुगनू"
चित्तौड़गढ़ के मूल किले का नाम था : चत्राद्रिगढ अथवा चतर गढ़। यह नाम अभी तक यहां प्राचीन किले के द्वार पर उत्कीर्ण है। इस में चत्र और अद्रि शब्द आए हैं जिनके अर्थ है विचित्र पहाड़। संस्कृत में अद्रि पहाड़ का पर्याय है। इस शब्द का पर्याय चित्रकूट होता है जिसे धीरे - धीरे चित्तौड़गढ़ कहा जाने लगा।
1302 ई . में यहां आए अमीर खुसरो ने इस किले का नाम "चतरंग" या "चत्र पहाड़ी" गढ़ ही लिखा है। इस किले के चट्टानों की ऊंची ढाल से घिरे उत्तरी द्वार को तब मंजनिक से पत्थर बरसाकर तोड़ा गया था। दो मंजनिकें लगाई गई थीं। ( देखिए : खजाइनुल फूतूह) खिलजिया हमले में टूटने वाले उत्तरी द्वार को बाद में रसिया की छतरी कहा जाने लगा। पूर्वी द्वार को भी तब क्षति पहुंचाई गई। हमले में शीर्ष भाग को नुकसान होना ही था।
कई वर्षों तक चित्तौड़गढ़ को देखता रहा और यहां के पुरातात्त्विक प्रमाणों और अभिलेखों का अध्ययन भी करता रहा। इसी चित्रंग पहाड़ी के दक्षिण में ऊपरी पहाड़ी टूक पर "चित्रांग" नाम से तालाब उससे पहले बना हुआ था क्योंकि महारावल समरसिंह के एक सूरह अभिलेख में चित्रांग तड़ाग के बीच वैद्यनाथ महादेव का सत्क ( देवली) बनवाने का उल्लेख है। यह अभिलेख पुरातत्त्व विभाग के संग्रह में है। (भारतीय अभिलेख परंपरा और ताम्रपत्र)
कहना न होगा कि इस किले का स्थापत्य सोलंकी शैली का है और इसके द्वार गुजरात के दभोई, झिंजुवाड़ा, जूनागढ़ और पावागढ़ के द्वार से पर्याप्त साम्यता लिए हैं। पथ के दोनों बाजू मजबूत भीत्तियां, सज्जा के लिए गौ धन, गजधन के रूप में नृत्य गणेश, अपराजिता जैसी देवियां, छाबनक, छज्जे, मुंडेर मेढी के रूप में अवलोकनक और भीतर तुला, शोभावटी, स्तंभ, प्रणाल, जलांतर आदि।
राजा सिद्धराज, भीमदेव, त्रिभुवनपाल और कुमारपाल के काल की स्थापत्य कला में ये सब दिखाई देते हैं। इनको ही अपराजित पृच्छाकार आचार्य भुवनदेव ने लिखा। समाधीश्वर देव के मंदिर में कुमारपाल का अभिलेख एक श्रमण की रचना है और दाएं बाजू स्वयं राजा - रानी की प्रतिमा। इस मंदिर का काम अगले कई वर्षों तक चला और शिल्पकारों ने अपने आत्मचित्र भी अंकित कर हस्ताक्षर किए।
( कई दिनों बाद आज सुबह जब श्री पवननाथ योगी का फोन आया तो मैंने कहा कि समीधेश्वर द्वार के "चित्रांग" नाम लिखे शिलापट्ट का फोटो भिजवाएं। बहुत देर की मेहनत के बाद श्रीपवन ने अक्षर पहचान कर चित्र भेज दिया। मैंने ये अक्षर 1989 ई. में पढ़े थे और तब से सोचता रहा कि यह एक पुरानी पहाड़ी का नाम था और किस तरह कथाओं की बुनाई होती रही। )
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