ग़ज़ल

 


मुझको मंज़िल नहीं समझा उसने 

दिल को भी दिल नहीं समझा उसने 


शख़्सियत उसकी निखर आई है 

दाग़ को तिल नहीं समझा उसने 


याद करना भी भुला देना भी 

कुछ भी मुश्किल नहीं समझा उसने 


बेवफ़ाई भी तो कर सकता था 

किसी क़ाबिल नहीं समझा उसने 


छुप के रोता है वो तनहा-तनहा 

मुझको शामिल नहीं समझा उसने 


मुझको मँझधार में वो छोड़ गया 

खुद को साहिल नहीं समझा उसने 


@धर्मेन्द्र तिजोरीवाले 'आज़ाद'

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