अपने धर्मग्रंथ प्रतिदिन प्रातःकाल नहा धो कर मात्र पुण्य कमाने के उद्देश्य से पढ़ने के लिए ही नहीं होते,अपितु, हमारे धर्मग्रंथों के रूप में हमारे पूर्वज/देवताओं ने अपने अनुभव हमें यह बताने के लिए लिपिबद्ध किया कि आगामी पीढ़ी ये जान सके कि यदि पुन: कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न अथवा निर्मित हो तो उससे कैसे निपटा जाए।हमारे ग्रन्थों में एक से एक असुर वो भी ऐसे ऐसे वरदानों से संरक्षित थे कि सोचकर उनको पराजित करने की हिम्मत ही ना हो।किसी को वरदान प्राप्त था कि वह न दिन में मरे,न रात में,न मनुष्य से मरे,न पशु से,न अस्त्र से मरे,न शस्त्र से मरे,न घर में मरे,न बाहर,न आकाश में मरे,न धरती पर,तो किसी को वरदान था कि उसके शरीर से रक्त की जितनी बूंदे जमीन पर गिरें उसके उतने प्रतिरूप पैदा हो जाएं,तो कोई अपने नाभि में अमृत कलश छुपाए बैठा था।फिर भी प्रत्येक राक्षस का वध हुआ।
यद्यपि सभी राक्षसों का वध अलग-अलग देवताओं तथा पृथक-पृथक कालखंड एवं भिन्न भिन्न स्थान पर हुआ।
देवताओं को उन असुरो को संहार करने के लिए उसी वरदान में से रास्ता निकालना पड़ा कि उस वरदान के विद्यमान रहते हुये इनको कैसे नष्ट कर सकते हैं। परिस्थिति कभी भी अनुकूल होती नहीं है, अपितु अनुकूल बनाई जाती है।
उदाहरण के लिए रावण को ही ले लेते हैं।अगणित तीर मारे और बीसों भुजाओं व दसों सिर भी काट दिए।
किन्तु,उसकी भुजाएँ व सिर फिर जुड़ जाते हैं तो इसमें क्या करें ? सारा दोष ब्रह्मा जी को दें कि जब स्वयं ब्रह्मा जी रावण को ऐसा अमरत्व का वरदान देकर धरती पर राक्षस-राज लाने में लगे हैं तो भला हम क्या कर सकते हैं?
अपितु, राम ने उन वरदानों के रहते हुए ही रावण का वध किया।
क्योंकि, यही "व्यवस्था" (सिस्टम) है।
हमारे पौराणिक धर्मग्रंथों में ऐसा एक भी साक्ष्य नहीं मिलता कि किसी राक्षस के वरदान (स्पेशल स्टेटस) को समाप्त कर पहले परिस्थिति अनुकूल की गई हो तदुपरांत उसका वध किया गया हो।अतः हमें भी परिवार, समाज या देश में जो भी जैसी भी परिस्थिति हो उसी में से रास्ता निकालना है।
सोचने वाली बात है कि जो रावण पंचवटी में लक्ष्मण के तीर से खींची हुई एक रेखा तक को पार नहीं कर पाया था,भला उसे पंचवटी से ही एक तीर मारकर मार देना क्या कठिन था?
अथवा जिस महाभारत को श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र के प्रयोग से क्षण में निपटा सकते थे भला उसके लिए 18 दिन तक युद्ध लड़ने की क्या आवश्यकता थी ? ऐसे ही हमें भी किसी समस्या या व्यक्ति से निपटने के लिये एक नियम से चलना चाहिये।पहले प्यार से, फिर समझा कर, तब भी काम ना बने तब अस्त्र-शस्त्र से काम लेना चाहिये।
रजनी मिश्रा।
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