ऊनी वस्त्रों की चमक के पीछे छिपा घना अंधेरा:


भारत में सर्दियों के मौसम में ऊनी स्वेटर, कोट, शॉल और कंबल हर घर में नजर आते हैं। शादियों के सीजन में लोग रेमंड के चमकते मेरीनो वुलन सूट में गर्व से दमकते नजर आते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गर्माहट देने वाले वुलन के हर कपड़ों के पीछे निरीह भेड़ों की चीख, दर्द,और क्रूर यातना छिपी होती है। भारत में अधिकांश वुलन कपड़े अस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड से आयातित भेड़ों के ऊन से बनते हैं। असलियत यह है कि ऊन निकालने की प्रक्रिया बेहद क्रूर और हिंसक है। दुनिया का लगभग 80% ऊन अस्ट्रेलिया से आता है, जहां मेरिनो (Merino) नस्ल की भेड़ों को विशेष रूप से ऊन के लिए पाला जाता है। उन उतारने के लिये इन भेड़ों पर साल में दो बार 'शीयरिंग' (कटाई) की जाती है, जो मशीनों से इतनी तेजी से की जाती है कि उनकी चमड़ी कट जाती है, खून बहता रहता है और दर्द से वे चीखती रहती हैं। बेचारी भेड़ें।..हजारों भेड़ें हर साल इस प्रक्रिया में घायल हो जाती हैं या मर जाती हैं। बाकी तो फिर अंत में मांसाहारियों के लिये उनका वध होना ही होना है। भेड़ें सबसे सरल और निर्दोष प्राणियों में से एक हैं, जो बचपन से ही आदमियों की इस क्रूरता का शिकार होती हैं। यह जान लें कि भैंस, मुर्गी, बकरी और भेड़ कभी भी अपनी मौत नहीं मरती हैं। उन सबका वध ही किया जाता है।


स्कल्पिंग और म्यूलिंग: ऊन उद्योग का काला सच


ऊन निकालने की हिंसा सिर्फ 'शीयरिंग' पर खत्म नहीं होती। अस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में 'म्यूलिंग' नामक प्रथा प्रचलित है, जिसमें भेड़ों के मेमनों की पूंछ को जड़ से काट दिया जाता है, ताकि मैगोट्स (कीड़े) न लगें और ऊन खराब न हो। बिना बेहोशी के यह सर्जरी की जाती है, जिससे भेड़ें असहनीय पीड़ा झेलती हैं। कई मामलों में तो उनकी मृत्यु तक हो जाती है। शीयरिंग में घायल भेड़ों के जख्मों को कई बार बिना बेहोशी के सुई से सीधे ही सिल दिया जाता है—यह दर्दनाक प्रक्रिया उनकी चीखों को और भयावह बना देती है। इसके अलावा, ऊन उत्पादन के अंत में भेड़ों को 'स्कल्पिंग' किया जाता है—यानी जिंदा भेड़ के गले पर चीरा लगाकर त्वचा उधेड़ ली जाती है। 

भारत में आयातित ऊन इसी का नतीजा है, जो सस्ते दामों पर बिकती है। भेड़ों पर होती क्रूरता के वीडियो PETA और अन्य एनिमल राइट्स संगठनों ने मेहनत से तैयार किये हैं जो कि खूनी सच्चाई दिखाकर मन को द्रवित कर देते हैं।


भेड़ की अपनी आवाज़: 


मेमना हूं मैं।

हां मैं लैंब हूं।

मिमियाता हूं मैं।

पर मां को वध के लिये

खींचता आदमी नहीं पिघलता।


भेड़ मेरी मां है।

पर उसका दूध मुझे नहीं मिलता।

मेरी आंखों के सामने 

छीन लिया जाता है।

मेरी मां को गर्मी देने वाली 

वूल उखाड़ लेता है 

बेदर्दी से नौंच लेता है 

आदमी खुद को 

गर्म करने के लिए।


कटी हुई पूंछ

छिली हुई नंगी चमड़ी 

कड़ाके की ठंड

मेरी मां का मिमियाना

चीखों में बदलकर

छुरी के नीचे 

दम तोड़ देता है।


आप आदमी हैं।

कभी गर्म वुलन पहनें

तो महसूस करलें 

उसमें छिपी 

मेरी मां की यातना

उसकी नंगी चमड़ी 

तड़पा -तड़पा कर काटा 

उसकी पथराई आंखों का सर।


मैं डरा हुआ मेमना

भूल गया मिमियाना 

इसी दर्द से गुजरते 

जल्दी ही मेरा नंबर 

भी है आना।


मेरी ये पंक्तियाँ ऊन उद्योग की पोल खोलती हैं। 

**


पर्यावरण और स्वास्थ्य पर भी बुरा असर:


ऊन सिर्फ पशु हिंसा तक सीमित नहीं। भेड़ पालन से बड़े पैमाने पर मीथेन गैस निकलती है, जो जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देती है। अस्ट्रेलिया के चरागाह भूमि क्षरण के शिकार हो रहे हैं। ऊन प्रोसेसिंग में भारी पानी और केमिकल्स लगते हैं, जो प्रदूषण फैलाते हैं। ऊनी कपड़े एलर्जी, खुजली पैदा कर सकते हैं।


गर्माहट बिना हिंसा के: क्या विकल्प हैं?: 

अब तो ऊन के कई विकल्प हैं -

कॉटन (रुई): ऑर्गेनिक कॉटन स्वेटर गर्म, सांस लेने वाले।

सिंथेटिक फाइबर्स: पॉलिएस्टर, फ्लीस—सस्ते, क्रूरता-मुक्त।

नैचुरल ऑप्शन्स: बांस, हेम्प—पशु-मुक्त गर्मी।

फैबइंडिया, बेनेटन आदि पर उपलब्ध।


जरा सोचें—आपके स्वेटर की गर्मी किसी भेड़ की चीख पर?


आगे का रास्ता: जागरूक उपभोक्ता बनें अबसे ऊनी वस्त्र न खरीदें। इनसे अहिंसा धर्म—की हानि होती है। सर्दी में गर्माहट जरूरी है, क्रूरता नहीं। आज से आगे के लिये ऊन का सामान खरीदना तो त्याग ही सकते हैं

-नीलमकांत जीवमित्र

9910378087

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