मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम: गुणों से प्रवाहित एक शाश्वत कथा

अयोध्या में श्रीराम का जन्म केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं था, बल्कि भारतीय चेतना में मर्यादा, करुणा और धर्म का अवतरण था। बाल्यकाल से ही उनके व्यवहार में ऐसी सहज कोमलता और संवेदनशीलता थी कि वे दूसरों के दुःख को अपना मान लेते थे। जब सीता जी को आश्वस्त करते हुए आशीर्वाद दिया जाता है, तब तुलसीदास उस करुणा को शब्द देते हैं —

“ सुन्नो सिय सत्य असीस हमारी। पूजहि मन कामना तुम्हारी ॥”(बालकाण्ड)

यह चौपाई श्रीराम के दीनदयालु, कृपालु और आश्रयदाता स्वरूप को स्थापित करती है।


श्रीराम की युवावस्था तक आते-आते यह स्पष्ट हो गया था कि वे केवल शस्त्रधारी वीर नहीं, बल्कि धर्मबुद्धि से युक्त योद्धा हैं। गुरु वशिष्ठ के आश्रम में उन्होंने सीखा कि बल तभी पवित्र होता है जब वह धर्म से जुड़ा हो। यही कारण है कि ताड़का वध जैसे प्रसंगों में भी श्रीराम का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, बल्कि ऋषियों की रक्षा था (बालकाण्ड)।


राज्याभिषेक का समय आया तो अयोध्या आनंद से भर उठी, किंतु उसी क्षण दशरथ के वचन ने श्रीराम के जीवन की दिशा बदल दी। राम ने राज्य और वन के बीच कोई तुलना नहीं की, क्योंकि उनके लिए वचन ही धर्म था। तुलसीदास इस आदर्श को अमर करते हैं—

“ रघुकुल रीत सदा चली आई। प्राण जाई पर वचन न जाई॥ ”( अयोध्याकाण्ड, दोहा)

यह दोहा श्रीराम की सत्यनिष्ठा और वचनबद्धता का मूल प्रमाण है।


वनगमन के समय श्रीराम ने पिता की आज्ञा को मस्तक पर धारण किया। उनके मुख पर न क्रोध था, न पीड़ा—केवल कर्तव्यबोध। तुलसीदास लिखते हैं—

“पितु आयसु सिर धरि जुहारी। निकसे राम संग महतारी॥ ”(अयोध्याकाण्ड)

यह चौपाई श्रीराम के आज्ञाकारी पुत्र और मर्यादित मनुष्य होने का सजीव उदाहरण है।

वन जीवन में श्रीराम ने वैभव का त्याग किया, पर आत्मसम्मान नहीं। उन्होंने कंद-मूल खाकर भी संतोष को अपनाया। तुलसीदास का यह कथन उनके जीवन में प्रत्यक्ष दिखता है—

“ संतोष परम सुख लहि कोई। संतोष बिना सुख नाहीं होई॥ ”(अरण्यकाण्ड)

यह चौपाई श्रीराम के संयम और संतुलित जीवन-दर्शन को पुष्ट करती है।

सीता जी के प्रति श्रीराम का व्यवहार मर्यादा और सम्मान से भरा था। उनका प्रेम अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व था। तुलसीदास कहते हैं—

“पति परमेश्वर सीय जानकी। सेवहिं सुमिरि सनेह सुहागी॥”( अरण्यकाण्ड)

यह चौपाई श्रीराम को आदर्श पति के रूप में प्रतिष्ठित करती है।


लक्ष्मण के साथ श्रीराम का संबंध केवल रक्त का नहीं, बल्कि आत्मा का था। संकट में वे लक्ष्मण को अपने प्राणों के समान मानते थे—

“ भ्राता लक्ष्मन प्रान समाना। परम सनेह बस राम सुजाना॥ ”( अरण्यकाण्ड)

यह चौपाई भ्रातृप्रेम और पारिवारिक मूल्यों का आदर्श प्रस्तुत करती है।


वन में ऋषि-मुनियों पर राक्षसों का आतंक बढ़ा तो श्रीराम ने निर्भय होकर अधर्म का सामना किया। वे जानते थे कि भय से धर्म दुर्बल हो जाता है—

“बयरू न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई॥”(अरण्यकाण्ड)

यह चौपाई श्रीराम के निर्भय रक्षक और न्यायप्रिय स्वरूप को स्पष्ट करती है।


सीता हरण के पश्चात श्रीराम का धैर्य टूटता नहीं। वे शोक में भी विवेकशील रहे। इसी समय उनकी मित्रवत्सलता प्रकट होती है, जब वे सुग्रीव से मित्रता कर उसके जीवन का उद्धार करते हैं ( किष्किन्धाकाण्ड) ।


हनुमान से भेंट में श्रीराम का हृदय भक्तिभाव से भर उठता है। उन्हें बल नहीं, प्रेम प्रिय है—

“ रामहि केवल प्रेमु पियारा। जान लेहु जो जाननहारा ॥”( सुन्दरकाण्ड)

यह चौपाई श्रीराम के भक्तवत्सल गुण को कथा में स्थापित करती है।


विभीषण जब शरण में आए, तब श्रीराम ने शरणागत धर्म को सर्वोपरि रखा—

“ सुनु विभीषण प्रभु की रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥ ”( लंका काण्ड)

यह चौपाई श्रीराम के शरणागतवत्सल और क्षमाशील स्वभाव को दर्शाती है।


समुद्र पार करने का प्रसंग श्रीराम के साहस और नेतृत्व का चरम बिंदु है—

“गरल सुधा रिपु करय मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥”( लंका काण्ड)

यह चौपाई असंभव को संभव करने वाले श्रीराम को दर्शाती है।


लंका विजय के बाद भी श्रीराम के हृदय में द्वेष नहीं। उन्होंने न्याय और करुणा के साथ शासन स्थापित किया। रामराज्य का चित्रण तुलसीदास इन पंक्तियों में करते हैं—

“दैहिक दैविक भौतिक तापा। रामराज नहिं काहूहि ब्यापा॥”(उत्तरकाण्ड)


और समाज की समानता को—

“ जग बहु नर सर सरि सम भाई। जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई॥”(उत्तरकाण्ड)


अंततः तुलसीदास श्रीराम को लोककल्याण का स्रोत बताते हैं—

“ मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी॥”( सुन्दरकाण्ड)


निष्कर्ष

इस कथा में प्रयुक्त चौपाइयाँ केवल उदाहरण नहीं, बल्कि ग्रंथीय साक्ष्य  हैं, जो सिद्ध करती हैं कि श्रीराम के 16 गुण—करुणा, सत्य, धर्म, संयम, संतोष, न्याय, साहस, भक्ति, क्षमा, परहित, मित्रता, नेतृत्व, समानता और आदर्श शासन—रामचरितमानस में कथा बनकर प्रवाहित होते हैं। यही कारण है कि श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं।

 डॉ. लवकुश सिंह चौहान,पुणे, महाराष्ट्र

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