अनिता रश्मि
कश्मीर में चिल्ले कलाँ अर्थात चालीस दिन की अत्यधिक सर्दी का समय। इन चालीस दिनों में सदा की तरह सारे व्यापारिक काम-काज ठप्प हैं।
देश के अन्य हिस्सों से कट गई है घाटी। आवागमन के सारे साधन बंद। सर्द हवाएँ हड्डियों को छेद डाल रही हैं।
जीना भी दुभर।
होटल के गर्म कमरे में बंद खिड़कियों से लगे पर्यटकों को रुई के फाहों से गिरते हिम किलकारी मारने पर विवश कर रहे हैं।
आए दिन की बर्फबारी देखकर पर्यटक फूले नहीं समा रहे हैं।
इसी का आनंद लेने के लिए तो वे यहाँ एक महीने से पड़े हैं।
चारों ओर बर्फ की चुनरी उन सबमें उल्लास राग जगा गई है।
गिरीश भी रतलाम से आए हैं। आज गिरीश दोपहर को बाहर निकले। सामने जमीन एकदम श्वेत। निगाहों की जद में दूर तक बस बर्फ ही बर्फ।
बहुत कम लोग नजर आ रहे थे। कुछ बर्फबारी देखने के लिए रुक गए लोग, कुछ हाथों में शाल, स्वेटर, मफलर, पोंचो थामे लोग।
कुछ भुट्टे आदि बेचते लोग भी थे।
गिरीश की आवाज में बर्फीली कँपकपाहट,
"हम स्नो फॉल के बाद का अद्भुत नजारा देखने के लिए होटल से बाहर आए हैं। पर इतनी ठंड में आप क्यों?"
उन्होंने भुट्टेवाले से भुट्टा खरीदते हुए पूछा।
"आपकी सेवा करने।"
"अरे! चिल्ले कलाँ में क्या जरूरत...?"
"जुरूरत है न साब जी! फरक सिरफ इतना है कि आप पैसा फेंकने निकले हैं, हम रोटी कमाने।"
उसने गर्मागर्म भुट्टा उनके हाथ में पकड़ाते हुए अपने भुट्टे समान दाँतों को निपोरा।
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