मृत्यु से संघर्ष नहीं, मृत्यु का स्वीकार-जीवन की अंतिम गरिमा

इसीलिए डॉ. लोपा अपनी लिविंग विल में स्पष्ट लिखती हैं कि जब उनका शरीर साथ देना बंद कर दे और सुधार की कोई संभावना शेष न रहे, तो न वेंटीलेटर लगाया जाए, न ट्यूब डाली जाए, न ही अनावश्यक चिकित्सकीय हस्तक्षेप किया जाए। उनका अंतिम समय शांति से बीते, जहाँ इलाज के * से अधिक समझदारी* और करुणा को प्राथमिकता दी जाए। उनके अनुसार, मृत्यु का स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि जन्म और मरण दोनों ही प्राकृतिक प्रक्रियाएँ हैं।

इसी भावना का प्रतिबिंब जैन दर्शन में भी दिखाई देता है। जब शरीर साथ देना बंद कर दे और मृत्यु समीप स्पष्ट दिखाई देने लगे, तब संथारा (संलेखना) लेकर मृत्यु का स्वागत किया जा सकता है। चौविहार, तिविहार अथवा आंशिक उपवास के माध्यम से समय रहते इच्छाओं और आसक्तियों का त्याग कर, शांत चित्त से देह त्याग करना जैन परंपरा में आत्मिक उत्कर्ष की साधना माना गया है। यह पलायन नहीं, बल्कि पूर्ण जागरूकता के साथ जीवन-यात्रा को पूर्ण करने की प्रक्रिया है।

पर वास्तविक प्रश्न यह है-क्या हमने अपने लिए ऐसा कुछ तय किया है?

क्या हमारे परिवारजन हमारी इस इच्छा का सम्मान करेंगे?

और यदि करेंगे, तो क्या समाज इसे सहजता से स्वीकार करेगा?

आज भी अनेक अस्पतालों में ऐसी इच्छाओं को सम्मान देने की स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। परिणामस्वरूप हर साँस पर बिल बनता है और हर मृत्यु पर किसी न किसी को दोषी ठहराया जाता है। इस स्थिति में रोगी की पीड़ा के साथ-साथ परिजनों का अपराधबोध और आर्थिक बोझ दोनों बढ़ते चले जाते हैं।

यह विषय सरल नहीं है। तर्क और भावना के बीच संतुलन साधना शायद जीवन की सबसे कठिन कसौटियों में से एक है। किंतु यदि हम मृत्यु को शांत, नियत और शरीर की स्वाभाविक गति से आई प्रक्रिया मानना सीख जाएँ, तो संभव है कि मृत्यु का भय कम हो और जीवन की गरिमा और अधिक उज्ज्वल हो जाए।

बुद्ध की भाषा में कहें तो- मृत्यु जीवन का अंत नहीं, बल्कि यात्रा का अगला चरण है। 

मेरे अनुसार, मृत्यु से लड़ने के बजाय उससे पहले अगले जीवन की तैयारी करनी चाहिए। और जब वह क्षण आए, तो उसे भय से नहीं, शांति, स्वीकार और सम्मान के साथ अपनाना चाहिए।

क्योंकि सच्चा साहस मृत्यु को हराना नहीं,बल्कि उसे मुस्कुराकर स्वीकार करना है। क्योंकि जीवन की पूर्णता वहीं है, जहाँ अंतिम साँस भी शांति की सुगंध छोड़ जाए। 

 सुगालचन्द जैन, चेन्नई


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