विश्व की बढ़ती अशांति और उसका समाधान : जैन दर्शन का संयम मार्ग

विश्व में असंख्य धर्मों के होते हुए भी आज मानव इतना अशांत, क्रूर और अनैतिक क्यों होता जा रहा है-यह प्रश्न हर संवेदनशील मन को मथता है। धर्मों की बाह्य उपासना बढ़ी है, परन्तु मानव का आचरण गिरा है। कारण स्पष्ट है- आज धर्म पूजा-प्रधान बन गया है, जबकि जीवन संयम-प्रधान नहीं रहा। उपासना-प्रधान धर्म इन प्रश्नों का ठोस उत्तर नहीं दे पा रहे, जबकि संयम-प्रधान धर्म, विशेषतः जैन दर्शन, इन समस्याओं का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करता है। दुर्भाग्यवश वर्तमान समय में संयम धर्म धर्म-सिंहासन पर आसीन नहीं है।

 आचार्य हेमचन्द्र ने धर्म की इसी विकट स्थिति पर गहन चिन्तन करते हुए अनुभव की भाषा में कहा- 

 “वीतराग! तुम्हारी पूजा करने की अपेक्षा तुम्हारे आदेशों का पालन करना अधिक महत्वपूर्ण है। तुम्हारे आदेशों का पालन करने वाला सत्य को प्राप्त होता है और उनका पालन न करने वाला भटक जाता है।—आचार्य महाप्रज्ञ ।।

आज भी जैन दर्शन के चारों स्तम्भ-श्रावक, श्राविका, साधु और साध्वियाँ-भगवान को तो मानते हैं, उनकी पूजा-स्तुति भव्यातिभव्य रूप से करते हैं, परन्तु उनके आदेशों को जीवन में उतारने से कतराते हैं। सरल और सहज जैन दर्शन को महाकठिन बताकर जनसामान्य को उससे दूर रखने का एक अनजाना प्रयास हो रहा है, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

भगवान महावीर द्वारा प्रतिपादित नियम अत्यंत सरल, व्यावहारिक और जीवनोपयोगी हैं- अहिंसा: किसी भी जीव को मन, वचन और काया से हानि न पहुँचाना; सत्य: ऐसा सत्य बोलना जिसे याद रखने के लिए अलग से प्रयास न करना पड़े; अचौर्य: चोरी न करना; ब्रह्मचर्य: इन्द्रिय संयम; और अपरिग्रह: अनावश्यक संग्रह से बचना। इन व्रतों को सरल भाषा में समझकर और विवेकपूर्वक अपनाने से जीवन स्वतः तनाव-मुक्त, संतुलित और शांत बन सकता है। इनके पालन के लिए न तो विशेष श्रम चाहिए, न ही अतिरिक्त साधन-केवल जागरूकता और निष्ठा आवश्यक है।

आज का विश्व हिंसा, पर्यावरण विनाश, मानसिक तनाव, लालच और असंतोष से जूझ रहा है। इन सभी समस्याओं की जड़ असंयम है और समाधान संयम में निहित है। जैन दर्शन केवल पूजा-पाठ का धर्म नहीं, बल्कि आचरण का विज्ञान है। यदि इसे उसके मौलिक स्वरूप में अपनाया जाए तो व्यक्ति ही नहीं, समाज और विश्व का भी रूपांतरण संभव है।

अतः मेरा विनम्र निवेदन है कि जैन दर्शन को सरल दर्शन ही रहने दिया जाए, चारित्र-प्रधान ही रहने दिया जाए। इसे अर्थ-प्रदान, भव्यातिभव्य प्रदर्शन, कायरता या भोगवाद का माध्यम न बनाया जाए। सम्यग् दर्शन, सम्यग् ज्ञान और सम्यक् चारित्र की त्रिवेणी को ही जन-जन तक पहुँचाने का प्रयत्न किया जाए। आज संसार अपनी वर्तमान समस्याओं के समाधान हेतु जैन दर्शन की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रहा है-आवश्यक है कि हम स्वयं पहले उसे अपने जीवन में उतारें। कृपया गंभीर चिन्तन-मनन करें, इन पाँच व्रतों का देश-काल-भाव के अनुसार अनुशरण करें और उनके प्रचार-प्रसार में सहभागी बनें। यही मानवता की सच्ची सेवा और विश्व शांति का स्थायी मार्ग है। 

 सुगालचन्द जैन, चेन्नई


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