ग़ज़ल


मुलाकातों के आईनों पर आज यह कैसी धूल जमी है..!

किसी को किसी अपनों की अब खलती क्यों नहीं कमी है..!


एक छत के नीचे रहते फिर भी रिश्तो में मीलो की दूरियां..!

जैसे आसमान से रहती दूर-दूर सदा सदा यह ज़मीं है..!


कभी पराए दर्द में भी अक्सर  आंखें भीग जाया करती थी..!

अब किसी ख़ास के दर्द में भी आंखों में आती नहीं नमी है..!


गरज हो तो बे-मौसम अपनेपन की बदली बरस जाती हैं..!

मौसम जैसा मिज़ाज रखते सब आदत हो गई मौसमी है..!


कमल सिंह सोलंकी

रतलाम मध्यप्रदेश

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