अंतर


पर्यटकों के स्वर्ग कश्मीर में चिल्ले कल्लां (अत्यधिक सर्दी ) का समय। चालीस दिनों से सदा की तरह सारे काम-काज ठप्प हैं। 

होटल की खिड़कियों से लगे पर्यटकों को रुई के फाहों से गिरते हिम किलकारी मारने पर विवश कर रहे हैं।आए दिन की बर्फबारी देखकर पर्यटक फूले नहीं समा रहे हैं।

इसी के लिए तो वे यहाँ एक महीने से हैं। चारों ओर बर्फ की धवल खूबसूरत चुनरी उन सबमें उल्लास राग जगा गई है। 

गिरीश भी रतलाम से आए हैं। आज गिरीश दोपहर को बाहर निकले। सामने जमीन एकदम श्वेत। निगाहों की जद में दूर तक बस बर्फ ही बर्फ। 

बहुत कम लोग नजर आ रहे थे। कुछ बर्फबारी देखने के लिए रुक गए पर्यटक, कुछ हाथों में शाल, स्वेटर, मफलर, पोंचो थामे लबादा-फिरन पहने लोग। कुछ भुट्टे बेचते लोग भी थे।

गिरीश की आवाज में बर्फ़ीली कँपकपाहट,

"हम पर्यटक स्नो फॉल के बाद का नजारा देखने के लिए होटल से बाहर आए हैं। इतनी ठंड में आप क्यों?"

उन्होंने भुट्टेवाले से भुट्टा खरीदते हुए पूछा।

"आपकी सेवा करने।"

"अरे! चिल्ले कल्लां में क्या जरूरत...?"

"...जुरूरत है न साब जी! इस बार सीजन बेकार गया। हम एक भी शॉल-स्वेटर बेच नहीं पाए थे। तब सातों कमाऊ लोग बीमारी में फँस गए थे।"

उसने गर्मागर्म भुट्टा उनके हाथ में पकड़ाया।

"आपके लिए बर्फ आन्नद है जी। और हमारे लिए...।"

उसने बात अधूरी छोड़कर भुट्टे समान दाँत निपोर दिए।


अनिता रश्मि

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